मैं रामलीला मैदान क्यूँ गया

अन्ना जी ने जब से अपना अनशन शुरू किया मैंने सोचा था की मैं इस आन्दोलन का साथ रेवाडी में रह कर ही दूंगा। अप्रैल में जब अन्ना जी बैठे तो मेरे साथी उनके आन्दोलन में साथ देने के लिए दिल्ली के लिए यहाँ से ट्रेन में और बसों में भर कर गए। मुझे भी उन्होने साथ आने को कहा परन्तु मैं नहीं गया।

मेरा तर्क ये था की दिल्ली में भीड़ ज्यादा करने से कोई फायदा नहीं होगा। यदि सभी दिल्ली में चले गए तो रेवाडी का क्या होगा? रेवाडी में तो कोई हलचल नहीं होगी ।विरोधी तो इसका मतलब यही लगायेगे की आन्दोलन सिर्फ चंद हाजर लोगों का था , कहीं किसी और कोने में तो कुछ हुआ ही नहीं। और यही हुआ भी अनेक मंत्रियों व् अनशन विरोधी भ्रष्ट नेताओं ने इसे ५००० की भीड़ का नाम दे डाला। अप्रैल का अन्ना जी का अनशन सफल तो हुआ पर ये सिर्फ दिल्ली और कुछ बडे शहरों तक ही सिमित माना गया।

मेरे कुछ साथियों के सहयोग से हम रेवाडी में एक दिन के धरने व् अनशन का आयोजन करने में सफल भी रहे । मेरे दिल को इस बात की बहुत तस्सली हुई की रेवाडी में भी कुछ हुआ और हम भी उस में शामिल थे। मैं उन दोस्तों का बहुत शुक्रगुजार हूँ की उन्होने रेवाडी की इज्जत बचा ली, वर्ना रेवाडी की इज्जत पर दाग लग जाता की जब भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद हो रहा था तो रेवाडी के लोग निष्क्रिय थे।

१६ अगस्त का अनशन लगभग तय हो चुका था पर मेरे मन में एक आशा थी की शायद सरकार ऐसा कुछ सोच ले की अन्ना हजारे के आन्दोलन की हवा निकल दी जाये और सब काम खुद ही कर के लोकपाल को ठीक करने के कुछ आश्वासन दे दिए जायेंगे और अनशन के प्रभाव को कम कर दिया जायेगा। परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं किया गया हमारे पास दस दिन का समय था जिसमे हम रेवाडी के लोगों में अनशन के बारे में कुछ जागरूकता लाना चाहते थे। हमे वो समय मिला और हमने रेवाडी के कुछ जागरूक लोगों के साथ एक मीटिंग कर के जनमत संग्रह का कार्य किया। लगभग ३५०० लोगों से संपर्क किया गया और उनकी राय भी ली।

जब अनशन शुरू हुआ तो एक दिन बाद ही हमे कुछ असरदायक लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ और रेवाडी में धरने का आयोजन करने का कार्यक्रम चल निकला। उस समय भी बहुत से लोग रामलीला मैदान में रोज जा रहे थे। मैं दिल ही दिल में सोचता था की यह सब रेवाडी में कैसे इक्कठा हो सकते है । एक दो लोगों को मैने बात ही बात में बताने की कोशिश भी की की मैं राम लीला मैदान क्यूँ नहीं जा रहा , क्यूंकि मुझे लगता है की मेरी रेवाडी में ज्यादा जरुरत है अगर यहाँ लोग कम हो जाते है तो ठीक असर नहीं पड़ता।

किन्तु अनशन के आखरी दिनों में मैने भी सोचा की रामलीला मैदान में क्यूँ न जाया जाये? मेरे एक काम के सिलसिले में मुझे दिल्ली जाना पड़ गया। उस दिन की अनशन में मेरी अनुपस्थिति बहुत लगों को खली, किन्तु शाम को आ कर मैने फिर अपना मोर्चा संभाल लिया। दिल्ली में मेरे एक दोस्त ने कहा की एक बार रामलीला मैदान में जा कर जरुर देखना चाहिए , क्यूंकि पता नहीं हमे जिन्दगी में दोबारा ऐसा मौका मिले या न मिले। ऐसा आन्दोलन फिर कभी हो या न हो, तो यह मौका हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए।

मैं अपने दोस्त के साथ मेट्रो में बैठ कर नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन के लिए निकल पड़ा। जब तक हम नई दिल्ली स्टेशन तक नहीं पहुचे थे तब तक तो वो एक आम मेट्रो की सवारी थी, किन्तु नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन के आते ही पता चल गया की अन्ना हजारे जी आस पास ही है, और हर उतरने वाला सिर्फ रामलीला मैदान के लिए ही जा रहा था।

स्टेशन से बाहर आते ही पहले तो गाँधी टोपी खरीदी , उसे पहनते ही एहसास हुआ ही हाँ अब इस हवन में शामिल होने की दीक्षा ले ली है। चारों और लगा की देश राष्ट्र भक्ति के पर्व में डूबा हुआ है और हर कोई अपना नाम उस पर्व में लिखवाना चाहता है। जो जितना इस रंग में रंगा हुआ है मानों वो उतना ही ज्यादा राष्ट्र भक्त है।

वहां मैं सिर्फ एक घंटा ही बिता पाया क्यूंकि रेवाडी से फ़ोन आने शुरू हो गए थे और मेरे बारे में पूछा जाने लग चुका था। जब मैने बताया की आज तो मैं रामलीला मैदान मैं हूँ तो बड़ी निराशा से एक दोस्त में कहा की अच्छा फिर आज तो तुम नहीं आओगे। मैने उसे आश्वासन दिया की शाम तक जरुर आ जाऊंगा ।

मुझे लगा की दोस्त की बात बिलकुल सही थी की न जाने फिर हमे ये मौका दुबारा मिलता या नहीं। इसके साथ ही मुझे लगता है की शायद मैं देश भक्ति की वो भावना शायद चूक जाता जो मुझे रामलीला मैदान में महसूस हुई। अन्ना जी के आन्दोलन के साथ तो दिल से था ही पर उस यात्रा ने इस आन्दोलन के साथ जुडने के जज्बे और जरूरत को शायद और पुख्ता कर दिया है ।
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